गुरुपूर्णिमा केवल उत्सव नहीं, आत्ममंथन का अवसर है

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गुरु का सम्मान केवल चरण स्पर्श से नहीं, बल्कि उनके दिए हुए संस्कारों को जीवन में उतारने से होता है।

गुरुपूर्णिमा आते ही देशभर में गुरुजनों का सम्मान किया जाता है। विद्यालयों, महाविद्यालयों और विभिन्न संस्थानों में कार्यक्रम आयोजित होते हैं। विद्यार्थी अपने शिक्षकों के प्रति आभार व्यक्त करते हैं। यह हमारी संस्कृति की सुंदर परंपरा है। लेकिन एक प्रश्न हर वर्ष हमारे सामने खड़ा होता है - क्या गुरु का सम्मान केवल एक दिन का उत्सव है, या पूरे जीवन का आचरण?

यदि अगले ही दिन हम अपने व्यवहार, अपनी भाषा और अपने विचारों में संयम खो दें, तो गुरुपूर्णिमा का वास्तविक उद्देश्य अधूरा रह जाता है।

आज का समय अभूतपूर्व अवसरों का समय है। ज्ञान हमारी उँगलियों पर उपलब्ध है। इंटरनेट, सोशल मीडिया और OTT प्लेटफ़ॉर्म ने मनोरंजन और जानकारी की दुनिया को हमारे सामने खोल दिया है। लेकिन इसी के साथ यह चुनौती भी बढ़ी है कि हम क्या देख रहे हैं, क्या सुन रहे हैं और किसे अपना आदर्श बना रहे हैं।

लोकप्रियता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण हैं, परंतु यदि इनके नाम पर अशिष्ट भाषा, अपमानजनक व्यवहार और असंवेदनशीलता सामान्य होती चली जाए, तो समाज को आत्मचिंतन करना ही होगा।

किसी भी लोकतंत्र में मतभेद होना स्वाभाविक है। सरकार, व्यवस्था या किसी नीति से असहमति व्यक्त करना प्रत्येक नागरिक का अधिकार है। लेकिन उस असहमति की भाषा और मर्यादा ही हमारे संस्कारों का परिचय देती है।

जब सार्वजनिक जीवन में कटुता, अपशब्द और अभद्रता सामान्य होने लगती है, तब प्रश्न केवल किसी एक घटना का नहीं रह जाता। तब प्रश्न यह बन जाता है कि क्या हम अपने युवाओं को केवल बोलना सिखा रहे हैं, या सही ढंग से बोलना भी सिखा रहे हैं?

गुरु केवल वह नहीं जो पाठ्यपुस्तक पढ़ाए। गुरु वह है जो सही और गलत के बीच का अंतर समझाए। जो ज्ञान के साथ विवेक दे। जो सफलता के साथ विनम्रता दे और जो अधिकारों के साथ कर्तव्यों का बोध भी कराए।

आज के समय में विद्यार्थियों पर अनेक प्रकार के प्रभाव हैं - प्रतियोगी परीक्षाओं का दबाव, करियर की चिंता, सोशल मीडिया का आकर्षण, त्वरित प्रसिद्धि की इच्छा और निरंतर बदलती जीवनशैली। इन सबके बीच यदि किसी चीज़ की सबसे अधिक आवश्यकता है, तो वह है मूल्य आधारित शिक्षा।

शिक्षा केवल डिग्री नहीं देती। शिक्षा बोलने का तरीका भी सिखाती है। मतभेद व्यक्त करने की मर्यादा भी सिखाती है। दूसरों का सम्मान करना भी सिखाती है और सबसे बढ़कर, स्वयं पर नियंत्रण रखना भी सिखाती है।

भारतीय संस्कृति में गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश के समान इसलिए नहीं माना गया कि वे केवल ज्ञान देते हैं, बल्कि इसलिए कि वे व्यक्ति के भीतर चरित्र का निर्माण करते हैं। यदि चरित्र कमजोर हो जाए, तो ज्ञान भी समाज के लिए उपयोगी नहीं रह जाता।

श्री उमिया कन्या महाविद्यालय का विश्वास है कि उच्च शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि ऐसे जिम्मेदार नागरिक तैयार करना भी है जो ज्ञानवान होने के साथ-साथ संस्कारी, संवेदनशील और मर्यादित भी हों। विशेष रूप से छात्राओं के लिए आत्मविश्वास जितना आवश्यक है, उतना ही आवश्यक है विवेक, संवेदनशीलता और सामाजिक उत्तरदायित्व।

गुरुपूर्णिमा पर यदि हम अपने गुरुजनों के प्रति सच्चा सम्मान प्रकट करना चाहते हैं, तो उसके लिए किसी बड़े आयोजन की आवश्यकता नहीं है।

बस इतना पर्याप्त है कि हम अपनी भाषा को संयमित रखें। अपने विचारों को मर्यादित रखें। अपने आचरण को संस्कारित रखें और जीवन में ऐसा कोई कार्य न करें, जिससे हमारे गुरु, हमारे माता-पिता या हमारे समाज का सिर झुक जाए।

याद रखिए...

गुरु का सबसे बड़ा सम्मान पुष्प अर्पित करना नहीं, बल्कि उनके दिए हुए संस्कारों को जीवन भर जीवित रखना है।

Editorial Desk

"समाज का भविष्य केवल बुद्धिमान युवाओं से नहीं, बल्कि संस्कारवान युवाओं से सुरक्षित होता है। गुरुपूर्णिमा हमें ज्ञान के साथ-साथ चरित्र निर्माण के महत्व की भी याद दिलाती है।"

 

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